पहले आधा घंटा अंग्रेजी..........
उसके बाद आधा घंटा गणित .............
उसके बाद आधा घंटा विज्ञानं............
फिर दोपहर के भोजन का अवकाश.............
फिर आधा घंटा हिंदी............
फिर थोडा खेलकूद(सिर्फ नाम के लिए)..............
और दिन ख़त्म होने तक बन गई खिचड़ी| रोज लगभग इसी
तरह का पाठ्यक्रम|
अध्यापको ने सभी विषयो को एक ही दिन मे पढाके
बना दी खिचड़ी| घर पहुचते पहुचते वो खिचड़ी हजम हो गई और बच्चे को बस १० प्रतिशत याद
रहा| ऊपर से घर पर करने को दिया गया काम सोने पर सुहागा| घर पर शाम को माँ बाप
किताबे लेके बैठे तो बच्चा अलग बगल झांकता है| क्युकी उसको ज्यादा कुछ याद ही नहीं
रह गया|
डांट , थप्पड़ , धमकी और कभी कभी डंडे के जोर पर
माँ बाप बच्चे को सब कुछ याद रखने के लिए बोलते है|
बच्चा क्या करें? उसकी गलती क्या है? किसी बड़े
व्यक्ति को भी अगर दिन मे चार विषय पढ़ा दिए जाएँ तो वो भी याद नहीं रख पाएगा|
एक दिन एक विषय.... क्या इस तरह पढाई संभव नहीं?
मेरे साथ भी यही होता था| एक दिन मे सुबह से शाम
तक सभी विषय को आधे आधे घंटे की घुट्टी पिलाके मास्टरजी घर भेज देते थे| घर आते
आते सब साफ़|
हमने झेला, अब हमारे बच्चे झेल रहे है| कोई फर्क
नहीं आया| अब भी सब कुछ वैसा ही चल रहा है| बस तकनीक ने पढाई करने और करवाने के
तरीके बदले| विद्यालय अब विद्यालय कम McCauley की औलाद ज्यादा लगते है|
क्यों हम “एक दिन एक विषय” पर जोर नहीं देते?
क्यों हम रोज सुबह बच्चे के विद्यालय ना जाने की
आनाकानी पर ध्यान नहीं देते?
क्यों हमारा बच्चा खुद से कभी नहीं कहता की माँ
मै रोज विद्यालय जाऊंगा?